साइलेंट किलर: क्यों 10 साल पहले ही भारतीय महिलाओं को शिकार बना रहा है हृदय रोग?
जयपुर। हृदय एवं रक्तवाहिका रोग (CVD) वर्तमान में वैश्विक स्तर पर महिलाओं की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बनकर उभर रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में महिलाओं की होने वाली कुल मौतों में से लगभग 35 प्रतिशत—यानी हर 3 में से 1 मौत—का कारण हृदय संबंधी बीमारियां हैं।
भारत में यह स्थिति और भी चिंताजनक रूप ले चुकी है। देश में महिलाओं की हृदय संबंधी मौतों का आंकड़ा 40 प्रतिशत के पार पहुंच चुका है। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि भारतीय महिलाओं को पश्चिमी देशों की महिलाओं की तुलना में लगभग एक दशक पहले (असमय) ही 'हार्ट अटैक' का सामना करना पड़ रहा है।
प्रमुख कारण और सामाजिक भ्रांतियां
भारतीय महिलाओं में कम उम्र में बढ़ते हृदय रोगों के पीछे उच्च रक्तचाप (हाई बीपी), मधुमेह (डायबिटीज), मोटापा, अत्यधिक मानसिक तनाव और गर्भावस्था के दौरान होने वाली जटिलताएं मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
इसके अतिरिक्त, समाज में फैली यह भ्रांति कि "हदय रोग केवल पुरुषों की बीमारी है", स्थिति को और अधिक विकट बनाती है। महिलाओं में हृदय रोग के लक्षण अक्सर असामान्य और हल्के होते हैं—जैसे घबराहट, हल्का सीने में भारीपन या अत्यधिक थकान। इन्हें अक्सर सामान्य एंग्जायटी या गैस की समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कार्यस्थल और घर की दोहरी जिम्मेदारी, बढ़ता तनाव तथा रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव इस जोखिम को कई गुना बढ़ा देते हैं।
भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में देश में इस्केमिक हृदय रोग से होने वाली मौतों में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है; जबकि अधिकांश उच्च व मध्यम आय वाले देशों में यह दर निरंतर घट रही है। सीधे शब्दों में कहें तो, वर्तमान में हृदय रोग प्रतिदिन स्ट्रोक और कैंसर की तुलना में अधिक महिलाओं की जान ले रहे हैं।
प्रारंभिक निदान और जीवनशैली में बदलाव: बचाव का मार्ग
अधिकांश हृदय संबंधी मौतों को सही जीवनशैली और जागरूकता के माध्यम से रोका जा सकता है:
* नियमित शारीरिक सक्रियता और संतुलित आहार।
* वजन का सही प्रबंधन और पर्याप्त नींद।
* धूम्रपान एवं मदिरापान से पूर्ण परहेज।
* रक्तचाप और तनाव का प्रभावी नियंत्रण।
यद्यपि केवल रोकथाम हर स्थिति में संभव नहीं होती, इसलिए बीमारी का प्राथमिक चरण में सटीक निदान (Early Diagnosis) मृत्यु दर और रोग-जनित जटिलताओं को न्यूनतम करने में अत्यंत निर्णायक साबित होता है।
आधुनिक डायग्नोस्टिक तकनीकें: अब पहचान हुई और भी सटीक
हृदय रोगों के समय रहते और सटीक आकलन के लिए अब ईसीजी और सामान्य रक्त जांचों के अलावा कई अत्याधुनिक नॉन-इनवेसिव इमेजिंग तकनीकें उपलब्ध हैं:
* इकोकार्डियोग्राफी (Echo): यह हृदय का एक विशेष सोनोग्राम है, जिसके माध्यम से हृदय की गतिशीलता, वाल्वों की स्थिति और उसकी पंपिंग क्षमता (इजेक्शन फ्रैक्शन) का आकलन किया जाता है।
* कार्डियक सीटी (Cardiac CT): यह कोरोनरी धमनियों की जांच के लिए सबसे तेज, सुरक्षित और दर्दरहित तकनीक है। पारंपरिक कैथेटर एंजियोग्राम (जो एक आक्रामक प्रक्रिया थी) की तुलना में कार्डियक सीटी के जरिए बिना अस्पताल में भर्ती हुए या सेडेशन दिए, कुछ ही मिनटों में धमनियों की रुकावट और महाधमनी (एओर्टा) की स्थिति का सटीक पता लगाया जा सकता है।
* कार्डियक एमआरआई (Cardiac MRI): यह हृदय जांच के क्षेत्र में सबसे उन्नत तकनीकों में से एक है। लगभग 30 मिनट की इस प्रक्रिया में रेडियोलॉजिस्ट हृदय की मांसपेशियों की ताकत, वाल्व की कार्यप्रणाली और हृदय पर बने किसी भी स्कार (दाग) का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। इसके आधार पर कार्डियक सर्जन यह तय कर पाते हैं कि मरीज का इलाज दवाओं से संभव है या शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की आवश्यकता है।
महिलाओं के लिए क्यों विशिष्ट हैं ये आधुनिक तकनीकें?
महिलाओं के हृदय की शारीरिक संरचना पुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत छोटी होती है। उनमें माइक्रोवास्कुलर डिसफंक्शन और नॉन-ऑब्स्ट्रक्टिव कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD) की संभावना अधिक रहती है।
कार्डियक एमआरआई (CMR) जैसी उन्नत तकनीकें MINOCA (नॉन-ऑब्स्ट्रक्टिव धमनियों के साथ मायोकार्डियल इंफार्क्शन), स्ट्रेस कार्डियोमायोपैथी और हृदय की सूजन संबंधी जटिल स्थितियों की समय पर पहचान करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही हैं।
> विशेषज्ञ परामर्श: ये सभी आधुनिक जांचें केवल विशेषज्ञ कार्डियक केंद्रों पर उपलब्ध होती हैं और इन्हें प्रशिक्षित कार्डियक रेडियोलॉजिस्ट की देखरेख में ही कराया जाना चाहिए।

