बाढ़ का पानी उतरा तो मैदान में उतरे संजय गुप्ता ‘पाइप वाले’, राहत के थैले के साथ तस्वीर पर जनता ने पूछे सवाल
शाहजहांपुर चार-पांच दिनों तक लगातार बारिश और जलभराव की मार झेलने के बाद अब कई इलाकों में पानी धीरे-धीरे कम होने लगा है।
लेकिन इसी के साथ बाढ़ प्रभावित इलाकों में समाजसेवा को लेकर एक नया सवाल खड़ा हो गया है। सवाल सीधे तौर पर संजय गुप्ता ‘पाइप वाले’ की सामने आई राहत सामग्री बांटते हुए तस्वीर को लेकर उठ रहे हैं।
जिस वक्त पानी लोगों के घरों और रास्तों तक पहुंच गया था, जिस वक्त परिवार परेशान थे और लोगों को राशन, पीने के पानी और जरूरी सामान की जरूरत थी, उस वक्त मदद की सबसे ज्यादा जरूरत थी
लेकिन अब जब पानी कम हो रहा है और हालात सामान्य होने लगे हैं, तब संजय गुप्ता ‘पाइप वाले’ जरूरतमंद को खाद्य सामग्री का थैला देते हुए दिखाई दिए।
तस्वीर सामने आने के बाद लोगों के बीच सीधा सवाल है—अगर समाजसेवा करनी थी तो सबसे मुश्किल वक्त में क्यों नहीं दिखाई दी?
जनता का कहना है कि बाढ़ के दौरान किसी जरूरतमंद के घर तक राशन पहुंचाना, पानी में फंसे परिवार की मदद करना, दवा पहुंचाना या जरूरतमंदों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में सहयोग करना असली जरूरत थी। उस समय मदद पहुंचती तो उसका असर भी अलग होता।
अब जब पानी उतरने लगा है, तब राहत सामग्री के साथ तस्वीर सामने आने पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि समाजसेवा का मकसद जरूरतमंद की मदद है या मदद के साथ तस्वीर भी जरूरी है?
हालांकि एक जरूरतमंद को राशन देना अपने आप में मदद है और उस मदद को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन जनता का सवाल इससे आगे का है। सवाल यह है कि मुसीबत के सबसे कठिन दौर में समाजसेवी कहां थे?
शाहजहांपुर में बाढ़ और जलभराव ने यह भी दिखाया कि हर प्रभावित इलाके की जरूरत एक जैसी नहीं होती। कहीं लोगों को राशन चाहिए, कहीं पीने का पानी, कहीं दवा, कहीं रास्ते की जरूरत और कहीं तत्काल राहत की। ऐसे में जनता चाहती है कि मदद सिर्फ उन स्थानों तक सीमित न रहे जहां कैमरा आसानी से पहुंच सके, बल्कि उन इलाकों तक भी पहुंचे जहां वास्तव में जरूरत सबसे ज्यादा है।
अब सवाल संजय गुप्ता ‘पाइप वाले’ से भी है—अगर यह अभियान समाजसेवा के लिए है, तो क्या इसका दायरा सिर्फ एक-दो तस्वीरों तक रहेगा या बाढ़ प्रभावित हर जरूरतमंद तक मदद पहुंचाई जाएगी?
क्योंकि जनता अब सिर्फ सोशल मीडिया की तस्वीर नहीं देखना चाहती। जनता यह देखना चाहती है कि मुश्किल वक्त में कौन उसके बीच खड़ा था, किसने बिना प्रचार के मदद की और किसने जरूरतमंदों तक वास्तव में राहत पहुंचाई।
2027 की राजनीतिक हलचल के बीच जनता की नजरें उन चेहरों पर भी हैं जो अभी से लोगों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में सिर्फ तस्वीरें नहीं, बल्कि जमीनी काम और जनता के साथ खड़े होने का रिकॉर्ड भी चर्चा का विषय बन सकता है।
जनता का सवाल साफ है—
जब पानी सिर के ऊपर था, तब मदद कहां थी?
जब परिवार परेशान थे, तब राहत का हाथ कहां था?
और अब पानी कम होने के बाद राहत का थैला लेकर तस्वीर क्यों?
क्या समाजसेवा सिर्फ कैमरे के सामने होगी, या जरूरत के वक्त जमीन पर भी दिखाई देगी?
अब इन सवालों का जवाब संजय गुप्ता ‘पाइप वाले’ और उनके समर्थकों को देना है।
क्योंकि जनता सब देख रही है—कौन कब आया, कहां आया और किस वक्त आया
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