अंगेज़ों का दौर था, एक गाँव में सभा हुई तो जो सबसे बुड्ढा व्यक्ति था, उसे भी बुला लिया था।

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 अंगेज़ों का दौर था, एक गाँव में सभा हुई तो जो सबसे बुड्ढा व्यक्ति था, उसे भी बुला लिया था। 


देश को आज़ादी कैसे मिलेगी, आज़ाद भारत कैसा होगा, इसपर मंच से एक से बढ़कर एक नेता भाषण दे रहे थे। बुड्ढा मंच के कोने में बैठा सब सुन रहा था


अच्छा संचालकों की भी एक समस्या थी, उन्होंने बुड्ढे को बुला तो लिया था, पर मंच देने में सब घबराने लगे थे कि बिन फ़िल्टर की बीड़ी पीने वाला ये बकलोला जाने क्या कह दे और बवाल हो जा


इसलिए काफ़ी देर तक इग्नोर किया गया, पर फिर एक नेताजी को सूझी कि लाओ बुजुर्गों का सम्मान किया जाए। उन्होंने मंच से पुकारा “... तो साथियों हमें अँग्रेज़ों से आज़ादी लेने के लिए, सिर्फ युवाओं की शक्ति ही नहीं, बुज़ुर्गों का अनुभव भी चाहिए। क्यों दादा जी


अब दादाजी बैठे-बैठे अगाह गए थे, वो चिढ़ के बोले “अँग्रेज़ों से आज़ादी तो कब की मिल गई होती, पर ये साले सब के सब चोर, असल मनहूस तो ये हैं जो कुर्सी पे बैठ गए निकम्मे कहीं के, अंगेज़ों के टट्टू


बुढ़ऊ ने अपनी फ्रस्ट्रैशन निकाली और बीड़ी जलाते हुए मंच से उतर गए

पर गाँव में हाहाकार हो गया।


इस सभा के खत्म होते ही एक और सीक्रिट सभा नेताजी के घर पर बुलाई गई। वहाँ जाने-माने लोग जैसे थानेदार, साहूकार, ज़मीदार, हमारे नेताजी, उनके साले, सरकारी चाकर सब इकट्ठे हो गए


बहस छिड़ी कि आखिर बुड्ढे ने ऐसा बोल कैसे दिया


सीक्रिट सभा देर रात तक चली, और तय हुआ कि बुड्ढे को बहुत ज़्यादा बोलने की सज़ा दी जायेगी... उसकी अँग्रेज़ों से शिकायत की जायेगी


रात में मस्त खर्राटे मारकर सोते बुड्ढे को चारपाई समेत उठा लिया गया। सीक्रिट सभा के बीच में बिठाया गया और हुक्म सुनाया गया कि “हम तुम-पे रॉयल क्राउन की बेइज़्ज़ती करने का झूठा आरोप लगवाकर फाँसी चढ़वा देंगे बुड्ढे, अभी भी समय है; माफ़ी माँग लो


बुड्ढे ने एक और बीड़ी निकाली, चिताह की एक और लकड़ी जलाई और कहा “हुज़ूर, मैंने ये थोड़ी कहा कि कौन चोर, निकम्मा टट्टू और हरामखोर है... मैंने किसी का नाम तो नहीं लिया


इसपर थानेदार बड़ी अदा से मुस्कुराते हुए बोला “ओहोहोहो, तुम्हें क्या लगता है कि हम इतने बेवकूफ़ हैं? हमें नहीं पता कि तुम ज़मीदार को टट्टू, नेता और साहूकार को चोर और हम पुलस वालों को निकम्मा कह रहे हो


 दशकों बाद आज बहुत सारे बुद्धिजीवीज़, ऐक्टिविसट्स, सेल्फ क्लैम्ड लिबरल्स और कॉमीज़ सफ़ाई देते फिर रहे हैं कि दिमागी नक्सल कौन है और कौन नहीं है.


लगता है आज फिर किसी बूढ़े ने मस्त बीड़ी सुलगाई है। C


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