*बीएसए बांदा से पत्रकारों के 'कड़वे' सवाल...✍️*
*1. आदेश का मकसद 'सुरक्षा' या 'पर्दाफाश' रोकना ?*
महोदय, आपने अपने आदेश (पत्रांक 667-75) में कहा था कि "कतिपय व्यक्ति विभागीय छवि को धूमिल करते हैं।" अब अछरौंड़ विद्यालय में बच्चों से बाल मजदूरी कराए जाने का वीडियो सामने आया है। क्या आपकी नज़र में 'विभागीय छवि' पत्रकारों के कैमरे से धूमिल हो रही है या आपके उन शिक्षकों के कृत्यों से, जो नौनिहालों के हाथों में किताब की जगह फावड़ा थमा रहे हैं ?
*2. अगर पत्रकार नहीं होते, तो यह अन्याय कैसे रुकता?*
आपके आदेश ने पत्रकारों की स्वतंत्रता को 'वैध परिचय पत्र' की बेड़ियों में जकड़ दिया है। अगर कोई स्वतंत्र नागरिक या स्थानीय पत्रकार इस बाल मजदूरी को कैमरे में कैद न करता, तो क्या आपका विभाग कभी जान पाता कि अछरौंड़ में बच्चों से मजदूरी कराई जा रही है? क्या आपका यह आदेश भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन को 'सुरक्षित कवच' देने के लिए नहीं है?
*3. 'सूचना' देने पर पाबंदी, 'शोषण' पर चुप्पी क्यों?*
आपने आदेश दिया है कि "बिना परिचय पत्र के किसी को अभिलेख न दिखाएँ और न ही कोई जानकारी दें।" महोदय, जब विद्यालय में बच्चों के साथ छुआछूत और भेदभाव हो रहा था, तब आपकी गोपनीय सूचना प्रणाली कहाँ थी? क्या आपकी गोपनीयता की शर्तें केवल पत्रकारों के लिए हैं, या उन शिक्षकों के लिए भी हैं जो खुलेआम 'बाल श्रम निषेध कानून' की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं?
*4. क्या आदेश अब निरस्त होगा?*
अछरौंड़ की घटना ने साबित कर दिया है कि सरकारी स्कूलों को 'बंद कमरों' की राजनीति की नहीं, बल्कि 'लोकतांत्रिक निगरानी' की जरूरत है। क्या आप इस शर्मनाक घटना के बाद अपने उस आदेश को वापस लेंगे, जिसने पत्रकारों के जरिए जनता तक सच पहुँचने के रास्ते में बाधा खड़ी की है?
*5. जिम्मेदारी किसकी ?*
वीडियो में स्पष्ट है कि शिक्षक मजदूरी का पैसा बचाकर सरकारी धन का दुरुपयोग कर रहे हैं। आपके आदेश का पालन न करने पर आपने खंड शिक्षा अधिकारियों का उत्तरदायित्व निर्धारित करने की बात कही थी। क्या अब आप उन शिक्षकों और जिम्मेदारों पर सख्त कार्यवाही करेंगे, या फिर आपका पूरा जोर सिर्फ पत्रकारों को विद्यालय से बाहर रखने पर ही रहेगा ?
*निष्कर्ष के लिए एक तीखी टिप्पणी:*
"महोदय, लोकतंत्र में चौथे स्तंभ (मीडिया) का काम कमियाँ दिखाना है ताकि उनमें सुधार हो सके। लेकिन जब प्रशासन


