सुप्रीम कोर्ट ने धरना-प्रदर्शनों को लेकर बहुत ही सख्त टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि विरोधाभासी दावे हैं। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि विरोध करना भी संवैधानिक अधिकार है तो व्यापार करना भी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े याचिकाकर्ताओं को झटका दिया कि धरना-प्रदर्शन स्थल पर हमेशा कब्जा करके नहीं रखा जा सकता। इस दौरान एक ऐसा समय भी आया जब वकीलों की कोलाहाल से सीजेआई सूर्यकांत नाराज हुए और बोला कि अदालत को मछली बाजार ना बनाएं।
सुप्रीम कोर्ट में सीईसी ज्ञानेश कुमार से जुड़ी अलग-अलग याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई शुरू हुई। सीजेआई सूर्यकांत की बेंच के सामने पुलिस की ओर से कथित अत्याचार, गैर-कानूनी हिरासत, लोगों की आवाजाही और प्रदर्शन रोकने, पत्रकारों और वकीलों पर हमले और न्यायिक आदेशों का कथित उल्लंघन शामिल है। साथ ही साथ धरना-प्रदर्शन की वजह से व्यापारियों पर पड़ने वाले असर और उनके काम में बाधा की शिकायतों पर भी सुनवाई हुई है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दो तरह के मामले हैं। एक तो प्रदर्शनकारियों की ओर से है और दूसरी तरफ व्यापारियों का पक्ष है, जिनका पक्ष सीनियर वकील मुकुल रोहतगी और अन्य रख रहे हैं।
रोहतगी ने दावा किया कि इनकी वजह से व्यापारियों का कथित रूप से 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
वहीं सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी प्रदर्शनकारियों का पक्ष रखने के लिए पेश हुईं।
एक मौके पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उन्होंने जबरन दुकानें बंद कराईं। कुछ मामलों में प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए। लेकिन, गुरुस्वामी ने कहा कि कोई हिंसक नहीं हुआ।