जुखैया तालाब को अमृत पिलाने निकले थे, खुद ही डकार गए: जलालाबाद में 1.72 करोड़ का सफेद हाथी तैयार
जलालाबाद शाहजहांपुर । उत्तर प्रदेश की योगी सरकार लखनऊ से चिल्ला-चिल्लाकर थक गई कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस है, लेकिन शाहजहांपुर के जलालाबाद नगर पालिका परिषद के कान में जूं तक नहीं रेंग रही। ऐसा लगता है कि जैसे ही कोई नियम या ईमानदार सिस्टम शाहजहांपुर की सीमा में कदम रखता है, उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। आइए, आपको जलालाबाद के बीचों-बीच चल रहे एक ऐसे अद्भुत चमत्कार से रूबरू कराते हैं, जिसे कागजों पर अमृत सरोवर और हकीकत में मलाई सरोवर कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
कभी लोग जिसे जुखैया तालाब के नाम से जानते थे, उसका भाग्य बदलने के लिए शासन ने लगभग 1 करोड़ 72 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट पास किया। तय हुआ था कि 6 महीने में यह तालाब ऐसा चमकेगा कि लोग मालदीव भूलकर यहीं पिकनिक मनाने आएंगे। लेकिन हकीकत? एक साल बीत चुका है। काम 50 फीसदी भी पूरा नहीं हुआ है, मगर बजट का लगभग 50 लाख रुपया ठेकेदार की जेब में मुस्कुराते हुए पहुंच चुका है। काम कछुए की रफ्तार से चल रहा है और भुगतान एक्सप्रेसवे की स्पीड से हो रहा है। वाह रे नगर पालिका का गणित...।
इस अमृत सरोवर के निर्माण में भ्रष्टाचार की एक ऐसी अंडरग्राउंड कहानी है, जिसे सुनकर बड़े-बड़े जादूगर भी शरमा जाएं। तालाब के गहरीकरण के लिए हुई खुदाई से हजारों डम्पर मिट्टी निकाली गई। नियम कहता है कि इस सरकारी मिट्टी की नीलामी होती या सरकारी कामों में लगती। लेकिन जलालाबाद में यह हजारों डम्पर मिट्टी रातों-रात हवा में गायब हो गई।
जब नगर पालिका प्रशासन और वर्तमान चेयरमैन शकील अहमद खां से पूछा जाता है कि मिट्टी कहाँ गई?, तो साहब लोगों को सांप सूंघ जाता है। इस मिट्टी के खेल में किसका घर भरा गया और किसकी जेबें गर्म हुईं, यह नगर पालिका का हर चश्मा पहनने वाला अधिकारी अच्छी तरह जानता है, बस जुबान पर नोटों का ताला लटका है।
जब से 2023 में चेयरमैन की कुर्सी पर शकील अहमद खां बैठे हैं, तब से जलालाबाद नगर पालिका में विकास का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का अमृतकाल चल रहा है। स्थानीय से लेकर बाहरी ठेकेदारों ने नगर में जितने भी निर्माण कार्य कराए, उनकी गुणवत्ता देखकर लगता है कि सीमेंट में बालू नहीं, बल्कि बालू में नाममात्र का सीमेंट मिलाया गया है। घटिया निर्माण और कमीशनखोरी की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि आम जनता अब त्राहि-त्राहि कर रही है। आम आदमी की सुख-सुविधाओं से इस प्रशासन को कोई लेना-देना नहीं है, इन्हें तो बस टेंडर की मलाई और कमीशन के आंकड़ों से सरोकार है।
पूरे प्रदेश में जब बाबा का डंडा चलता है तो भ्रष्टाचारियों की रूह कांप जाती है। अन्य जनपदों में अधिकारी फाइलों को खंगालते हैं, सस्पेंशन लेटर बांटते हैं। लेकिन जैसे ही बात शाहजहांपुर जनपद और विशेषकर जलालाबाद नगर पालिका की आती है, तो बड़े-बड़े दबंग और ईमानदार अधिकारियों का चश्मा धुंधला हो जाता है। आखिर वो कौन सा अदृश्य राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव है, जिसके आगे यह पूरा सिस्टम नतमस्तक है? शाहजहांपुर जनपद आज की तारीख में घोटालों का गढ़ बनता जा रहा है और जलालाबाद नगर पालिका इसमें चार कदम आगे चल रही है।
जनता के टैक्स के पैसे को इस तरह सफेद हाथी बनाकर ठगने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। जलालाबाद नगर पालिका के इस महा-भ्रष्टाचार के खिलाफ आज से एक बड़ा खोजी अभियान शुरू किया जा रहा है। हर एक फाइल, हर एक घोटाला और हर एक कमर्शियल सेटिंग को बेनकाब किया जाएगा। देखते हैं कि अब कौन सा अधिकारी इस अमृत सरोवर की मलाई को बचाने सामने आता है। सच सामने आएगा, और डंके की चोट पर आएगा।
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