डेढ़ दशक से हिस्ट्रीशीटर एडवोकेट पर भरपूर कृपा दृष्टि रखने बाले नेताओं सहित हरदोई पुलिस कहाँ थी? जब मा0 हाई कोर्ट ने सीबीआई को दागी अधिवक्ताओं की ब्लैक लिस्ट बनाने का निर्देश दिया था। तथा दागी अधिवक्ताओं की सूची सीबीआई से तैयार करने के लिए कहा था। जब कोर्ट ने एडवोकेट रोल तैयार करने, दागी वकीलों को विधि व्यवसाय से पृथक करने तथा सरकारी वकीलों की नियुक्ति मानक मामले में सभी जिला पुलिस प्रमुखों से दागी वकीलों की सूची बार कौंसिल को देने का भी आदेश दिया था। तब हरदोई पुलिस ने माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशन में उपरोक्त हिस्ट्रीशीटर के आपराधिक इतिहास समेत उसका नाम नहीं भेजा, और उसके बाद जब भाजपा सरकार बनी तो उसके बाद उल्टे अविधिक, दूषित तरीके से तत्कालीन डीएम हरदोई पुलकित खरे के निर्देशन में एडीएम संजय कुमार सिंह ने
उपरोक्त हिस्ट्रीशीटर को तहसील सदर हरदोई का नामिका वकील नियुक्त कर दिया, इतना ही नहीं मेरी शिकायत पर उन्होंने मुझसे भी अविधिक बहस करते हुए कहा था कि अब बन गया तो बन गया, हटाया नहीं जा सकता, तभी मैंने उनसे कहा था कि मैं नहीं चाहता कि आपको माननीय उच्च न्यायालय में पार्टी बनायें लेकिन आप ऐसी बात करेंगे तो आखिर मैं आपको भी पार्टी बनाने के लिए विवश हो जाऊँगा, तब बड़ी जद्दोजहद के बाद उन्होंने उपरोक्त नामिका वकील का आबद्ध निरस्त तो कर दिया लेकिन उसके विरुद्ध किंचित विधिक कार्यवाही तक नहीं की थी! हालांकि यह भी मात्र बानगी है, बाकी अन्य बहुत से सवाल हैँ—जैसे पुलिस ने उसके ऊपर दर्ज मुकदमों की विधिवत विमुक्ति आख्या का विश्लेषण क्यों नहीं किया? क्यों समय रहते VW, NVW जारी नहीं किए गए ? क्यों समय-समय पर विधिक कार्यवाही नहीं की गई ? क्यों समयबद्ध उसके सहित उसके गिरोह के एवं अन्य शाहाबाद के हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी नहीं की गई? क्यों कोतवाली में लगी हिस्ट्रीशीटरों की चौपालों में उसके और उससे जुड़े H. S. 26 ए एवं H. S. 26 के साथी हिस्ट्रीशीटरों एवं अन्य किसी भी राजनैतिक असर रखने बाले हिस्ट्रीशीटर को भी क्यों हाजिर आना अनिवार्य नहीं किया गया? क्यों समुचित डोजियर नहीं भरे गए ? और क्यों जब वह नामिका वकील नियुक्त किया गया तो पुलिस ने अपनी रिपोर्ट डीएम को नहीं भेजी? और क्यों उससे बर्षों पूर्व अधिवक्ता रजिस्ट्रेशन के दौरान अपनी रिपोर्ट राज्य विधिज्ञ परिषद को प्रेषित नहीं की? और क्यों बार एसोसिएशन हरदोई में सदस्यता ग्रहण करते समय या उसके बाद अपनी रिपोर्ट नहीं भेजी? और क्यों उसके अन्य साथियों पर गुण्डा एक्ट की कार्यवाही के दौरान प्रबल पैरवी नहीं की? और क्यों— H. S. 26 पर दो बार गुण्डा एक्ट की कार्यवाही के बाद विधिसम्मत पैरवी नहीं की? और क्यों उसे जिला बदर नहीं कराया गया ? और क्यों इस बिषय पर भी पुलिस व प्रशासन द्वारा गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया कि जो उसकी भल्मंसी से भलीभांति परिचित होने का शपथ पत्र जरिए अधिवक्ता कलेक्ट्रेट कोर्ट में प्रस्तुत कर रहे हैं, उनमें भी क्या कोई गुण्डाएक्ट में निरुद्ध व्यक्ति तो नहीं है? और क्यों तत्कालीन डीएम या एडीएम या उनके सम्बंधित लिपिक ने अपनी ही कोर्ट के गुण्डाएक्ट के रजिस्टर नहीं देखा? और क्यों सम्बंधित लिपिक समेत सम्बंधित सरकारी वकील की याददास्त इतनी कमजोर हो गई कि उन सभी ने आखिर यही नहीं समझ पाया कि एक गुण्डा एक्ट का रिकॉर्ड पर आरोपी उनके न्यायालय में दूसरे गुण्डा एक्ट के आरोपी को सीधा भला व्यक्ति सिद्ध करते हुए सज्जनता का शपथपत्र दे रहा है?👇
ऐसे और भी तमाम सवाल शुरू से ही खड़े होते रहे हैँ जिनका गला घोटने का काम येन-केन-प्रकारेण पुलिस व प्रशासन निरंतर करता रहा है और जब-जब मेरे जैसे लोग नहीं अपितु इस जिले में सिर्फ मैं विरोध किया हूँ तो यही सिस्टम उल्टा मेरे ऊपर ही चढ़ दौड़ा है? और अविधिक मुकदमे बदनीयती, बेईमानी से दर्ज किए हैं और मेरे सभी पुष्ट तथ्यों, साक्ष्यों को नकार कर आरोपपत्र यहीं नहीं बल्कि अपने और H.S. 26 समेत वादिनी मुकदमा आदि के बचाव में दिल्ली तक दाखिल किए हैं।👉जनहित में जिनके जबाब तब नहीं तो अब सही परन्तु जनहित एवं न्यायहित में अंततः हरदोई पुलिस और प्रशासन को सार्वजनिक करने ही चाहिए?
👉और यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि आखिर हिस्ट्रीशीटर 157 ए उपरोक्त के—क्षेत्र पंचायत सदस्य निर्वाचित होने के बाद और समाजवादी पार्टी में चले जाने के बाद और ब्लॉक प्रमुख की दावेदारी करने के बाद और पहले ब्लॉक प्रमुख शाहाबाद और बाद में मंत्री जी एवं उनके खास लोगों से बगावती तेवर सोशल मीडिया पर हद से ज्यादा वायरल करने के बाद आखिर अब क्यों और ऐसी क्या विवशता पुलिस के सामने आई कि अपने ही संरक्षण में पालित-पोषित गिरोह के एक मात्र हिस्ट्रीशीटर उपरोक्त 157 ए के विरुद्ध किसी और की तहरीर पर नहीं अपितु कथित हिस्ट्रीशीटर बी (जिनका एक मात्र फोटो बीते दौर में इसी स्थानीय कोतवाली में टंगा रहा जो कि बाद में राजनैतिक दबाव में ही हटाया गया, जिस टंगे हुए फोटो का फोटो अब भी यदि मैं अपना रिकॉर्ड खंगालूंगा तो कहीं न कहीं उम्मीद है कि जरूर मिल जाएगा) के बेटे की तहरीर पर लम्बे अंतराल के बाद आखिर एक उसी मामूली से संदिग्ध मुख़्तार नामे को लेकर लिखा गया, जिस पर पहले न लिखा जाना भी काफी काबिलेगौर है? और यह भी कम काबिलेगौर नहीं कि आखिर अब क्यों पुलिस-प्रशासन इतने बर्षों बाद अचानक हिस्ट्रीशीटर बी की खातिर कुम्भकर्णी नींद से इतनी तेजी से जागकर दौड़-भाग, लिखा-पढ़ी शुरू कर दिया कि न केवल हिस्ट्रीशीटर बी के बेटे की तहरीर पर दर्ज किए गए मुकदमे में उसका नाम बढ़ा दिया बल्कि फ़िल्मी स्टाइल में उसे कई असफल प्रयासों के बाद आखिर गिरफ्तार कर लाई और उसके बाद करीब आधी रात में जेल भेज दिया? सूत्र बताते हैं मुकदमे में एक राय होने की धारा भी बाद में बढ़ाई गई? तभी आरोपी हिस्ट्रीशीटर शनिवार को जेल से बाहर नहीं आ सका क्योंकि उसकी जमानत शुक्रवार को जिन धाराओं में हुई थी, उसमें इसी एक धारा में जमानत नहीं हो पाई थी?
और तो और सवाल यह भी है 👇
कि हिस्ट्रीशीटर उपरोक्त 157 ए के ही साथी उपरोक्त हिस्ट्रीशीटर 26 ए समेत उसके साथियों ने इसी माह की बीती 5 सितंबर को
शाहाबाद में नगर के मोहल्ला अल्लाहपुर में नेशनल हाइवे के किनारे से लेकर अल्लाहपुर तिराहे की शराब दुकानों/कैंटीनों के सामने और दुर्गा ढाबा पर घोर गदर काटा, मारपीट की और उसके बाद मौलागंज चौराहे पर भी सरेआम शराब का नशा दिखाया, फिर भी स्थानीय पुलिस मूकदर्शक बनी रही, हालांकि सूत्र बताते हैं कि आधी रात करीब तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक आईपीएस सीओ शाहाबाद आलोक राज नारायण ने मामले का संज्ञान लेते कोतवाली पुलिस को जब कड़ी फटकार लगाई तभी कोतवाली पुलिस हरकत में आई और उसने अपनी सरकारी गाड़ी इधर-उधर घुमाई, इतना ही नहीं एक मात्र उपरोक्त हिस्ट्रीशीटर 26 ए को पकड़ भी लाई लेकिन पुलिस ने उसे हिरासत में लेने के बाद भी उसी रात कोतवाली से मंत्री जी के चमचों के दबाव में छोड़ दिया! ऐसी परिस्थिति में विचारणीय है कि या तो पुलिस पर मंत्री के बजाय मंत्री के चमचों का दबाव ही पर्याप्त है या फिर मंत्री ने ही रात में पुलिस पर दबाव बनाया, भले इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो रही है। कुल मिलाकर पुलिस ने खुल्लमखुल्ला समाज में भय व आतंक व संत्रास व्याप्त कर अपनी घोर गुंडागर्दी का नवीनीकरण करने बाले हिस्ट्रीशीटर 26 ए आदि को बिल्कुल माफ कर दिया, जिसका तस्करा भी जीडी में अंकित किया गया या नहीं, इधर यह भी पुलिस बताने में आनाकानी कर रही है और मेरी शिकायत पर भी अभी तक न FIR दर्ज की है और न तहरीर की पर्ची दी है और न मेरी लिखित एवं मौखिक गुहार पर अल्लाहपुर तिराहे से लेकर दुर्गा ढाबा और मौलागंज चौराहे के CCTV फुटेज निकलवाकर दिए हैं और न घटना बाले दिनाँक 5 सितंबर 26 की उसकी एवं उसके साथियों की कॉल डिटेल्स (CDR) निकलवाकर उपलब्ध कराई है? उल्टे टॉल मटोलकर पुष्ट साक्ष्य मिटाने पर एक बार फिर कोतवाली आमादा है?
👉पुलिस की इस जबरदस्ती से यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हिस्ट्रीशीटर 26 ए भी बदलते राजनैतिक माहौल में अपने साथी हिस्ट्रीशीटर उपरोक्त 157 ए से गद्दारी करने की नीयत से या अपने उल्लू सीधे करने की नीयत से मंत्री के खास चमचों सहित हिस्ट्रीशीटर बी से मिलकर कोई नई आपराधिक साजिश रच रहा हो जिसमें जहाँ उधर उसके ऊपर निशाना साधा गया तो इधर मेरे ऊपर भी निशाना साधा जा रहा हो? वैसे भी इतना तो सिद्ध है कि बीती 5 सितंबर की रात कहीं न कहीं से कई साल बाद उसके समेत उसके संगठित आपराधिक तथा नशा तस्कर गिरोह और घंटाचोर गिरोह का मनोबल एक बार फिर इतने चरमोत्कर्ष तक बढ़ा कि उसने मेरे मोहल्ले में न केवल नगर के बल्कि मेरे मोहल्ले के भी अपने गिरोह के साथियों के साथ एक राय होकर न केवल मेरी दिन से ही निगरानी (रेकी) की व कराई बल्कि देर रात तक जब निगरानी, पतारसी, सुरागरसी के बाद भी वह मेरे ऊपर हमला करने में असफल रहा तो उसने देशी शराब की दुकान/कैंटीन से लेकर मोहल्ले बालों तक से शराब पीते हुए ऐलांनियाँ गन्दी-गन्दी गालियाँ देते हुए कहा कि पप्पू दीक्षित को खबर करके यहाँ बुलाओ, जब उन लोगों ने मना किया तो वह अपने साथियों के साथ फिर एक राय होकर एक स्वर में बोला कि फोन करके बताओ कि हम लोग गालियाँ दे रहे हैं, कुल मिलाकर हमले में असफल रहने की स्तिथि में उसने कई लोगों को उकसाकर भी मुझे अल्लाहपुर तिराहे पर बुलाने का काफी प्रयास किया, मुझे खबर भी मिली लेकिन मैं पहले से ही डिस्क स्लिप होने से पीड़ित पड़ा था, ऊपर से भयंकर हड्डी तोड़ बुखार सिरदर्द में विस्तर से उठने की स्तिथि में नहीं था, फिर भी जैसे तैसे विस्तर से उठा, और जब चबूतरे पर निकला तो मोहल्ले के लड़कों ने मुझे रोंककर फिर घर के अंदर ले जाकर लिटा दिया और तत्काल पता करके बताया कि हम लोगों के तिराहे जाने से पहले ही वह सभी लोग वहाँ से चले गए। आप बाहर मत जाना। हालांकि उस दिन के बाद भी वह अपने साथियों से मेरी ही नहीं बल्कि मेरे घर की हर रात मेरी गली से निगरानी करा रहा है?
अंततः फिर वही कहावत बलबती कि “समय बड़ा बलवान है, नहिं मानुष बलवान" पर एक आखिरी सटीक कटाक्ष 👉 यह कि डेढ़ दशक में जहाँ न तत्कालीन डीएम पुलकित खरे और न एडीएम संजय कुमार सिंह के विरुद्ध विधिक या विभागीय कार्यवाही हुई और न पुलिस के किसी कार्मिक के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही हुई और न उपरोक्त हिस्ट्रीशीटरों समेत संगठित गिरोह के अन्य सदस्यों से सम्बंधित RTI का जबाब न देने पर किसी थानाध्यक्ष या प्रभारी निरीक्षक, सीओ के विरुद्ध कार्यवाही हुई? और न हिस्ट्रीशीटर 26 ए समेत उसके अभ्यस्त संगठित अंतर्राज्जीय गिरोह के विरुद्ध समुचित विधिक कार्यवाही हुई? और न इन सबका बचाव करते हुए मेरे विरुद्ध अविधिक दूषित फर्जी मुकदमे बदनीयती बेईमानी से दर्ज करने व कराने बालों और विवेचकों समेत गिरोह का अविधिक दूषित तौर तरीकों से बचाव करते हुए मेरे समस्त मौलिक अधिकारों का हनन कर मेरा सपरिवार सम्पूर्ण जीवन चौपट करने बाले प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण तथा समग्र पर्यवेक्षण अधिकारियों के विरुद्ध कोई विधिक या विभागीय कार्यवाही हुई? और न सम्बंधित उप जिलाधिकारियों, तहसीलदारों, नायब तहसीलदारों, राजस्व निरीक्षकों, लेखपालों, कार्यालय लिपिकों, पेशकारों के विरुद्ध इस गिरोह का पक्ष लेने पर एवं मुझे प्रताड़ित करने पर किंचित कार्यवाही हुई, और न IGRS की शिकायतों में फर्जी आख्याएँ लगाने एवं कई शिकायतों को बिना निस्तारण के ही पोर्टल पर लंबित छोड़ देने पर कोई समीक्षा या विधिक एवं विभागीय कार्यवाही हुई? और उल्टे भ्रष्ट तंत्र द्वारा समय-समय पर मुझे दबाने-झुकाने, प्रताड़ित करने, हाथ पैर तुड़वाने, जान से मरवाने, गिरफ्तार करने और जेल भिजवाने के लिए तरह - तरह के अविधिक दूषित हथकंडे अति कुत्सित मानसिकता से अपनाए, आजमाए गए, जिससे मेरा सपरिवार लगभग सम्पूर्ण जीवन चौपट हो गया, संविधान प्रदत्त ऐसा कोई मौलिक अधिकार नहीं जिसका हनन नहीं हुआ, यहाँ तक कि मेरी ख्याति से जुड़ी पत्रकारिता पर भी निरंतर कुठाराघात किया गया, और तो और मुझे मेरे ही संयोजन में आयोजित विराट कवि सम्मलेन एवं लोकप्रिय नागरिक सम्मान समारोह में तत्कालीन पुलिस अधिकारियों से एक राय होकर शाहाबाद के एक SHO आंनद नारायण त्रिपाठी ने सरकारी जीप से मय हमराही फोर्स के साथ श्री रामलीला मैदान मोहल्ला पठकाना में जाकर मंच का माइक छीनकर ऐलानियां मुझे काव्यपाठ करने से तो रोक ही दिया बल्कि माइक से घोषणा कर दी कि पप्पू दीक्षित नहीं बोलेंगे। जिसके वीडियो अब भी वायरल हैं, इतना ही नहीं पुलिस ने मेरे पालतू जर्मन सैफर्ड डॉग को पुलिस ने दबिश के दौरान मेरी छत से उसके भौंकने की उसकी स्वाभाविक गलती पर उसे मेरी छत से नीचे पक्के चबूतरे पर फेंक दिया, जिससे वह कमर से बेकार हो गया, जिसका उचित उपचार स्थानीय पशु चिकित्सालय में नहीं किया गया, जिसका इलाज बरेली तक से कराया परन्तु मैं उसे बचा नहीं पाया, अंततः उसकी मौत हो गई तो मैंने कोतवाली में उसके पोस्टमार्टम कराने हेतु तहरीर दी किन्तु पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने की बजाय उल्टा मुझे उसे चुपचाप कहीं दफ़न करने के लिए धमकाया, जिससे मैंने विवशताबश उसका बिना पोस्टमार्टम किए ही अंतिम संस्कार कर दिया। उसी बीच मुझे फेसबुक कॉल से मुझे सपरिवार बम से उड़ाये जाने की धमकी मिली जिसकी भी शिकायत मैंने तत्कालीन पुलिस से की लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात, अंततः किसी ने मेरी एक न सुनी, इतना ही नहीं स्थानीय पुलिस को जब मेरे विरुद्ध कुछ भी गैर कानूनी नहीं मिला तो ट्रैफिक पुलिस को मेरे पीछे लगाया गया, कई बार यातायात पुलिस ने मुझे प्रताड़ित किया, किन्तु जब मैंने शिकायत की तो मेरी IGRS की शिकायत में पुलिस ने कार्यवाही करने की बजाय मेरे विरुद्ध बदनीयती से आखिर जिले भर में 8 मुकदमे दर्ज दर्शाकार दुस्साहसिक रूप से शिकायत का निस्तारण कर दिया। फिर भी ट्रैफिक पुलिस ने पीछा नहीं छोड़ा तो अंततः मैंने तंग आकर इलेक्ट्रिक स्कूटी खरीद ली लेकिन सत्य से परे नहीं लिखा बल्कि सत्य ही लिखता रहाजिसका नतीजा एक बार फिर यह निकला कि पुलिस ने कुछ महीने पहले ही प्रकाशित समाचारों के प्रतिशोध स्वरूप और संगठित गुण्डों, हिस्ट्रीशीटरों समेत अपने खुद के बचाव में एक फिर फर्जी अविधिक दूषित मुकदमा पूरी तरह बदनीयती तथा बेईमानी से पंजीकृत कर दिया, यद्वपि उसमें भी वादी मुकदमा के विरोध और तहरीर में नाम बढ़ाने बाले लेखक की आत्मा जाग्रत हो जाने के परिणामस्वरूप अब नामजदगी गलत? किए जाने के सूत्र मिल रहे हैं। हालांकि मेरा यह सब उपरोक्त लेख भी बानगी भर है क्योंकि मेरे मौलिक अधिकारों का हनन और मेरा उत्पीड़न तो मेरे बचपन से ही निरंतर हो रहा है जिसके जितने पुष्ट प्रमाण मेरे पास विपक्षीगणों समेत पुलिस के लाख प्रयास के बाद भी सुरक्षित हैं, उतने इस मातृभूमि पर शायद ही किसी के पास सुरक्षित हों?
कुल मिलाकर फिर वही बात कि वक्त होत बलबान नहीं मानुष बलबान पर चल रही थी तो समझिये कि अब जब वक्त बदला तो 👇
👉मंत्री जी से बगावत के परिणामस्वरूप सूत्रों के अनुसार कभी जिस पुलिस व प्रशासन, सरकार, न्यायालय ने उपरोक्त किसी भी अविधिक कृत्य करने बाले, कदाचार करने बाले अपने किसी कार्मिक के विरुद्ध किंचित कार्यवाही नहीं की, परन्तु अब जब राजनैतिक दबाव बना तो वर्तमान में जिला पुलिस अधिकारी ने अपने दारोगा/ प्रभारी पुलिस चौकी जामामस्जिद दृगपाल सिंह गौर के प्रति इतनी कठोरता दिखाई कि उसे उपरोक्त आरोपी एडवोकेट से मात्र मुलाक़ात करने पर ही निलंबित कर जाँच शुरू कर दी। यद्वपि *मीडिया सेल जनपद हरदोई* द्वारा *दिनांक 13/09/2026* को जारी *प्रेस नोट* भले सत्य होते हुए भी इतनी सच्चाई से परे बताया जाता है कि दारोगा का निलम्बन मात्र एडवोकेट/हिस्ट्रीशीटर धीरू बाजपेई से दुरभिसन्धि के खुलाशे के परिणामस्वरूप ही किया गया है। हालांकि ऐसा कोई जिक्र जारी प्रेस नोट में नहीं है। लेकिन यह विचारणीय तो है ही कि पहले सत्ता, सरकार, पुलिस, प्रशासन, सिस्टम ही जब पूरे गिरोह को संरक्षण दे रहा था, तब और अब में कितना बड़ा अंतर सामने है? यह अलग बात कि अब भी सरकार सहित पुलिस धीरू बाजपेई को निशाने पर रखकर उसके ही गैंग के दूसरे हिस्ट्रीशीटर 26 ए सहित उसके अंतर्राज्जीय गांजा तस्कर गिरोह को और धीरू बाजपेई के धुर विरोधी हिस्ट्रीशीटर बी को भरपूर संरक्षण दे रही है? फिलहाल मामले के विवेचक/चौकी इंचार्ज थाना शाहाबाद पर नियुक्त उ0नि0 ना0पु0 दृगपाल सिंह गौर (PNO 902370430) का धीरू बाजपेई से मेल-मिलाप पुलिस विभाग सहन नहीं कर पाया? यह अलग बात कि जारी प्रेस नोट के अनुसार उन्हें कार्य सरकार मे रूचि न लेने ,लम्बित विवेचनाओ के निस्तारण में लापरवाही बरतने के, उच्चाधिकारीयों के आदेश-निर्देशों की अवहेलना करने आमजनमानस के साथ अभद्र व्यवहार करने के संबंध में श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय, जनपद हरदोई द्वारा उ0नि0 ना0पु0 दृगपाल सिंह गौर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर विभागीय जांच आसन्न की गई है।* इसी के साथ जारी प्रेसनोट के अनुसार *जनपद के समस्त पुलिस अधिकारी/कर्मचारीगणों को निर्देशित किया जाता है कि कोई भी पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यों/दायित्वों के प्रति उदासीनता/शिथिलता न बरते अन्यथा सम्बन्धित के विरुद्ध कड़ी दण्डात्मक कार्यवाही की जाएगी।*
कुल मिलाकर यही तो आश्चर्य है कि बीते दौर में पूरे गिरोह को भरपूर सरकारी संरक्षण देने पर भी किसी कांस्टेबल, SI, SHO, इंस्पेक्टर, CO, ASP, SP, DM, ADM, SDM, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, लेखपाल आदि के विरुद्ध कहीं से भी कोई कार्यवाही नहीं की गई? यहाँ तक कि बीती 5 सितंबर को नगर में हुए भयंकर गदर से व्याप्त भय व आतंक व संत्रास के बाद हिरासत में लेकर छोड़े गए हिस्ट्रीशीटर 26 ए के मामले में भी किसी पुलिस कार्मिक के विरुद्ध कोई विभागीय एवं विधिक कार्यवाही नहीं की गई ? आखिर क्यों? क्या इसलिए कि H.S. 26 ए समेत उसका अभ्यस्त अंतर्राज्जीय नशा तस्कर गिरोह पहले की तरह ही अब भी मंत्री जी के बहुचर्चित कृपापात्रों के पूर्णतः संरक्षण में पालित-पोषित है।
आखिरी सवाल जिसका जबाब मेरे पास भी नहीं क्योंकि मिर्जापुर जिले की पुलिस शुरू से ही दूरभाष पर स्पष्ट जबाब नहीं दे रही है और मेरे इस सवाल पर बहानेबाजी पर आमादा है कि क्या थाना अहरौरा पुलिस टीम द्वारा अनुमानित कीमत ₹ 15 लाख के कुल 51 किलो अवैध गांजा तस्करी में प्रयुक्त वाहन (होण्डा सिटी कार) के साथ 02 अंतर्राज्यीय गांजा तस्कर को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने के बाद जमानत पर छूटने से अब तक आखिर उनके विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट के अन्तर्गत कार्यवाही हुई कि नहीं— इधर इस सवाल का जबाब हरदोई पुलिस चाहें तो अपने स्तर से पता करके न केवल मुझे बता सकती है बल्कि आगे की कार्यवाही भी करवा सकती है? उपरोक्त गिरफ्तार गांजा तस्करों में जमानत के बाद एक आरोपी की मौत हो चुकी है।
👉ताजा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उपरोक्त हिस्ट्रीशीटर एडवोकेट के अतिरिक्त उसके गिरोह के बाकी हिस्ट्रीशीटर 26 ए समेत सभी अब भी भाजपा सहित मंत्री जी के खासमखास चमचों के ही संरक्षण में फल-फूल रहे हैं और फर्श से अर्श तक का सफर तय कर लिए हैं? इस गैंग में दर्जनों लग्जरी कारें हैं, जिनमें अधिकतर टैक्सी कोटे में पीली नम्बर प्लेट बाली हैं, और सूत्रों की मानें तो कई नीली व लाल बत्तीयों बाली भी वक्त-जरुरत उपलब्ध हैं? उनके अतिरिक्त सूत्र बताते हैं कि कई अधिकारियों के लिए जो आउट सोर्सिंग गाड़ियां हैं उनमें भी इस गिरोह के कई चालक हैं जो अधिकारी को उनके आवासों में उतारने के बाद फ्री हो जाते हैं? इतना ही नहीं कई एम्बुलेंस के चालक भी इस गिरोह के गुर्गों सहित गुर्गियों से जुड़े बताए जाते हैं? और तो और इसी गिरोह के कुछ लोग समय-परिस्थिति के हिसाब से गले में Stethoscope (परिश्रावक) लटकाकर डॉक्टर बन जाते हैं, वैसे भी इस गिरोह में कई निजी क्लीनिक, अस्पताल संचालकों समेत तथाकथित पत्रकार भी शामिल हैं जिनके पास पत्रकारिता के न केवल परिचयपत्र हैं बल्कि सूचना कार्यालय तक उनकी गिनती मेरे जैसे पत्रकारों से अधिक औकात बाली बताई जाती है! इस संगठित गिरोह से जुड़े बहुत से पुलिस व प्रशासनिक व स्वास्थ्य विभाग समेत सिस्टम के न जाने कितने ज्ञात, अज्ञात कार्मिक हैं जो वक्त जरुरत इनके लिए कहीं भी कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर रहते हैं। इस गिरोह के पास जैसा अधिकारी और जैसा वॉस वैसी व्यवस्थाएँ हैं। इसीलिए यह गिरोह काफी समर्थ हैं हालांकि आजकल पुलिस और मंत्री सहित उनके लोगों के सीधे निशाने पर चढ़ा हिस्ट्रीशीटर 157 ए एडवोकेट केवल इसलिए इस गिरोह का खास था या है क्योंकि वह कोर्ट कचहरी और कलेक्ट्रेट न्यायालय आदि में गहरी पैठ रखता और वक्त जरुरत इन सबके काम आता है, बदले में इन सबसे उसे क्या लाभान्स प्राप्त होता है अंततः यह साक्ष्य संकलन का बिषय है?
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👉बात अभी बांकी है👇
क्रमशः अगली किसी पोस्ट में जो आप सबको पढ़ाएंगे उसकी बानगी अभी इतनी समझ लीजिये कि 👉 इसी गैंग के कई अन्य हिस्ट्रीशीटर और भूमाफिया भी हैं जो सीधे कथित सरगना हिस्ट्रीशीटर 26 ए से जुड़े हैं, जिसमें एक हिस्ट्रीशीटर ऐसा भी है जो हिस्ट्रीशीटर 26 ए का भी सरगना है और उसके ऊपर भी सपा, बसपा, भाजपा तीनों की असीम कृपा रही है, जबकि उस par🙏कमसेकम भाजपा की नहीं होनी चाहिए? फिर भी जमात की करामात के कारण उसे भी सरकारी संरक्षण इस कदर अब भी मिला है और पुलिस में भी उसकी गहरी पैठ कितनी है इसकी इतनी सी बानगी मात्र से ही जो समझना चाहें, अंततः समझ सकता है कि उसका एक बार RTI के माध्यम से इसी नगर के निवासी एक व्यक्ति ने आपराधिक इतिहास माँगा तो तत्कालीन पुलिस समेत प्रभारी निरीक्षक आदि सम्बंधित अधिकारियों ने उस हिस्ट्रीशीटर का आपराधिक इतिहास बिना किसी विधिक भय के निल लिखने का दुस्साहस कर दिखाया—जबकि यह जानकर कोई भी व्यक्ति भला कैसे विस्मित नहीं होगा ? और कौन दांतों तले उँगलियाँ नहीं दबा लेगा?
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जिन्दगी रही तो हम आत्मरक्षार्थ तथा जनहित में ही फिर लिखेंगे जरूर 🙏क्यों न परिस्थितियाँ कितनी ही बिषम होकर रह जाएँ?
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