सच्चाई का बुलडोजर या सरकारी इंसाफ?40 साल का आशियाना ढहा,अब खुले आसमान तले अमृत काल मनाएगा रामलड़ैते का परिवार

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सच्चाई का बुलडोजर या सरकारी इंसाफ?40 साल का आशियाना ढहा,अब खुले आसमान तले अमृत काल मनाएगा रामलड़ैते का परिवार


​जलालाबाद शाहजहांपुर। गर्मियों की तपती दोपहर में जब बड़े-बड़े साहब एसी कमरों में बैठकर गरीब कल्याण की फाइलें सरका रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त जमीन पर कानून का राज स्थापित करने के लिए एक शानदार तमाशा होता है। मामला जलालाबाद थाना क्षेत्र के गांव एलमनगर का है। मंगलवार की शाम करीब 4:00 बजे, जब सूरज ढलने की तैयारी में था, ठीक उसी वक्त प्रशासन पूरी शौर्य और वीरता के साथ पुलिस बल और एक अदद चमचमाते हुए पीले बुलडोजर (जेसीबी) को लेकर रामलड़ैते के कच्चे घर के सामने आ डटा।

​इसके बाद जो हुआ, वह कानून की किताबों में सफल अतिक्रमण हटाओ अभियान कहलाएगा और मानवीय संवेदनाओं के इतिहास में क्रूरता की पराकाष्ठा। 40 साल से जिस जमीन को रामलड़ैते अपना आशियाना समझ रहा था, उसे पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया। दो झोपड़ियां, कच्चा मकान और प्यास बुझाने वाला सरकारी नल— सब कुछ जमींदोज।

​पीड़ित रामलड़ैते का रो-रोकर बुरा हाल है। उसका कहना है कि वह इस मौरूसी (पैतृक) जमीन पर पिछले 40 सालों से काबिज है। उसके पास कागजात भी हैं, लेकिन साहब जब पड़ोसी खेत वाले वेदराम वर्मा जी का दबाव और प्रशासन का प्रभाव एक हो जाए, तो कागज सिर्फ रद्दी का टुकड़ा बनकर रह जाते हैं। वेदराम जी काफी समय से इस जमीन को खाली कराने का पुण्य प्रयास कर रहे थे, जिसमें आखिरकार मंगलवार को उन्हें सरकारी आशीर्वाद मिल ही गया।

​प्रशासन कितना संवेदनशील है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने रामलड़ैते का घरेलू सामान सड़क पर नहीं फेंका। बड़े ही आदर के साथ सारा सामान पास की यूकेलिप्टस की बगिया में सुरक्षित रखवा दिया गया है। अब रामलड़ैते का परिवार, उसके बच्चे और बुजुर्ग इस भीषण गर्मी और आने वाले मानसून में खुले आसमान के नीचे प्रकृति का सीधा आनंद ले सकेंगे।

​दिलचस्प बात यह भी है कि जिसे सरकार डिजिटल इंडिया में हर घर आवास और शौचालय देने का दावा करती है, उस रामलड़ैते को आज तक एक अदद सरकारी शौचालय या आवास नसीब नहीं हुआ। हां, सरकारी बुलडोजर जरूर नसीब हो गया।

​जब इस सराहनीय बहादुरी पर प्रशासनिक अधिकारियों से बात की गई, तो उनका तर्क सुनकर आप भी कानून के आगे नतमस्तक हो जाएंगे।

​अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई कोई मनमानी नहीं है, बल्कि उच्च न्यायालय के निर्देश पर एसडीएम कोर्ट के आदेशानुसार पूरी तरह संवैधानिक है। रही बात पुनर्वासन (रहने की वैकल्पिक व्यवस्था) की, तो उसकी कोई जरूरत ही नहीं थी। जांच में पता चला है कि इस परिवार के नाम पर गांव में पहले से ही एक घर कागजों में मौजूद है।

​अब साहब को कौन समझाए कि अगर कागजों वाले घर से धूप और बरसात रुक जाती, तो कोई 40 साल से इस कच्चे घर में अपनी जिंदगी न खपाता। फिलहाल, एलमनगर का यह गरीब परिवार मलबे के ढेर पर बैठकर अपनी किस्मत और सिस्टम की इस अद्भुत फुर्ती को निहार रहा है।

​वाह री व्यवस्था बड़े-बड़े भू-माफियाओं के सामने जिसकी फाइलें खो जाती हैं, वह एक गरीब की झोपड़ी देखकर कितनी जल्दी एक्शन मोड में आ जाती है।

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