🏭🚨 सीतापुर की ऐतिहासिक प्लाईवुड फैक्ट्री का मामला अब अंतरराष्ट्रीय मोड़ पर — ब्रिटिश हाई कमिश्नर को लिखा गया पत्र
सीतापुर शहर के हुसैनगंज इलाके में स्थित ऐतिहासिक हेनरी थॉमसन प्लाईवुड प्रोडक्ट्स फैक्ट्री का मामला अब स्थानीय प्रशासन से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है।
कभी एशिया की प्रतिष्ठित औद्योगिक इकाइयों में गिनी जाने वाली इस फैक्ट्री की करीब 150 बीघा की बेशकीमती जमीन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
🏭 एशिया की शान रही फैक्ट्री
यह फैक्ट्री वर्ष 1939 में ब्रिटिश नागरिक हेनरी थॉमसन और उनकी बहनों द्वारा स्थापित की गई थी।
एक समय था जब —
✔ इस फैक्ट्री का प्लाईवुड ऑस्ट्रेलिया से नेपाल तक निर्यात होता था
✔ लगभग 1000 से अधिक कर्मचारी यहां तीन शिफ्टों में काम करते थे
✔ सीतापुर की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक पहचान इसी फैक्ट्री से जुड़ी थी
लेकिन वर्ष 1987 में ब्रिटिश मालिकों के भारत छोड़ने के बाद यह फैक्ट्री धीरे-धीरे बंद हो गई और पिछले लगभग 25 वर्षों से पूरी तरह वीरान पड़ी है।
⚖ प्रशासन की बड़ी कार्रवाई
सीतापुर प्रशासन ने हाल ही में इस जमीन को लेकर बड़ा कदम उठाया।
जिलाधिकारी राजा गणपति आर ने 11 फरवरी 2026 को एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि —
👉 यदि इस जमीन का कोई वैध मालिक सामने नहीं आता
👉 या कोई कानूनी दावा सिद्ध नहीं होता
तो इस संपत्ति को राज्य सरकार के राजस्व में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इसके लिए प्रशासन ने 30 दिनों का समय भी दिया था।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह जमीन शहर के बीचों-बीच बेहद कीमती मानी जाती है।
🇬🇧 अब ब्रिटिश एंट्री
इसी बीच सीतापुर के पूर्व पालिकाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष मिश्रा ने इस मामले में एक नया मोड़ ला दिया है।
उन्होंने भारत में ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरन को एक औपचारिक पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि —
✔ ब्रिटिश रिकॉर्ड के माध्यम से हेनरी थॉमसन के असली वारिसों की तलाश की जाए
✔ जब तक असली उत्तराधिकारी सामने न आ जाएं, तब तक किसी भी सरकारी कार्रवाई को रोका जाए
आशीष मिश्रा का कहना है कि इस संपत्ति पर कुछ लोगों ने दावेदारी की है, लेकिन मूल मालिक ब्रिटिश नागरिक थे इसलिए उनके वारिसों की पहचान जरूरी है।
🧑🏭 मजदूरों और रोजगार का मुद्दा
पत्र में यह भी कहा गया है कि —
✔ हजारों भारतीय मजदूर इस फैक्ट्री से जुड़े थे
✔ यदि सही स्वामित्व के साथ फैक्ट्री का पुनरुद्धार (Revival) होता है
तो सीतापुर में —
👉 बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सकता है
👉 शहर की पुरानी औद्योगिक पहचान वापस आ सकती है
🇮🇳 बड़ा सवाल — क्या फिरंगियों को सौंपना सही होगा?
अब इस पूरे मामले में एक बड़ा राष्ट्रीय और नैतिक सवाल भी खड़ा हो रहा है।
👉 क्या भारत की जमीन को फिर से विदेशी वारिसों के हवाले करना सही होगा?
👉 क्या इतने वर्षों से खाली पड़ी जमीन को राज्य सरकार अपने नियंत्रण में लेकर औद्योगिक विकास के लिए उपयोग नहीं कर सकती?
कई लोगों का मानना है कि —
✔ यदि जमीन सरकार के पास आती है
✔ तो यहां नया उद्योग, औद्योगिक पार्क या रोजगार परियोजना शुरू हो सकती है
जिससे हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा।
वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि कानूनी स्वामित्व का सम्मान करना भी जरूरी है।
⚡ सीतापुर प्रशासन का सख्त रुख
पिछले कुछ महीनों में जिलाधिकारी राजा गणपति आर के नेतृत्व में सीतापुर प्रशासन कई बड़े फैसले ले चुका है —
✔ अवैध कब्जों पर कार्रवाई
✔ नगर निकायों का औचक निरीक्षण
✔ राजस्व जमीनों की जांच
✔ गैस कालाबाजारी पर छापेमारी
✔ प्रशासनिक पारदर्शिता पर सख्ती
इसी क्रम में यह प्लाईवुड फैक्ट्री का मामला भी सीतापुर के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा फैसला बन सकता है।
🔥 सीतापुर के लिए क्या है सही रास्ता?
अब पूरे जिले की नजर इस सवाल पर है —
👉 क्या ब्रिटिश वारिस सामने आएंगे?
👉 क्या यह जमीन राज्य सरकार के खाते में जाएगी?
👉 या फिर इस ऐतिहासिक फैक्ट्री का पुनरुद्धार होगा?
जो भी फैसला होगा, उसका असर सीतापुर के उद्योग, रोजगार और शहर की पहचान पर पड़ेगा।
📢 आपकी क्या राय है?
क्या यह जमीन सरकार के पास आकर नए उद्योग के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए
या फिर ब्रिटिश वारिसों को खोजकर उन्हें सौंपना चाहिए?
कमेंट में जरूर लिखें।
Sitapur plywood factory dispute
Henry Thomson plywood factory Sitapur
Sitapur British factory land issue
DM Sitapur land action
Sitapur industrial history
#SitapurNews
#SitapurHistory
#PlywoodFactory
#DMAction
#SitapurDevelopment
#SitapurIndustry
#UPNews
#BreakingSitapur
#IndustrialHeritage
#SitapurViral
#sitapurplywoodfactry
#d🏭🚨 सीतापुर की ऐतिहासिक प्लाईवुड फैक्ट्री का मामला अब अंतरराष्ट्रीय मोड़ पर — ब्रिटिश हाई कमिश्नर को लिखा गया पत्र
सीतापुर शहर के हुसैनगंज इलाके में स्थित ऐतिहासिक हेनरी थॉमसन प्लाईवुड प्रोडक्ट्स फैक्ट्री का मामला अब स्थानीय प्रशासन से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है।
कभी एशिया की प्रतिष्ठित औद्योगिक इकाइयों में गिनी जाने वाली इस फैक्ट्री की करीब 150 बीघा की बेशकीमती जमीन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
🏭 एशिया की शान रही फैक्ट्री
यह फैक्ट्री वर्ष 1939 में ब्रिटिश नागरिक हेनरी थॉमसन और उनकी बहनों द्वारा स्थापित की गई थी।
एक समय था जब —
✔ इस फैक्ट्री का प्लाईवुड ऑस्ट्रेलिया से नेपाल तक निर्यात होता था
✔ लगभग 1000 से अधिक कर्मचारी यहां तीन शिफ्टों में काम करते थे
✔ सीतापुर की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक पहचान इसी फैक्ट्री से जुड़ी थी
लेकिन वर्ष 1987 में ब्रिटिश मालिकों के भारत छोड़ने के बाद यह फैक्ट्री धीरे-धीरे बंद हो गई और पिछले लगभग 25 वर्षों से पूरी तरह वीरान पड़ी है।
⚖ प्रशासन की बड़ी कार्रवाई
सीतापुर प्रशासन ने हाल ही में इस जमीन को लेकर बड़ा कदम उठाया।
जिलाधिकारी राजा गणपति आर ने 11 फरवरी 2026 को एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि —
👉 यदि इस जमीन का कोई वैध मालिक सामने नहीं आता
👉 या कोई कानूनी दावा सिद्ध नहीं होता
तो इस संपत्ति को राज्य सरकार के राजस्व में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इसके लिए प्रशासन ने 30 दिनों का समय भी दिया था।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह जमीन शहर के बीचों-बीच बेहद कीमती मानी जाती है।
🇬🇧 अब ब्रिटिश एंट्री
इसी बीच सीतापुर के पूर्व पालिकाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष मिश्रा ने इस मामले में एक नया मोड़ ला दिया है।
उन्होंने भारत में ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरन को एक औपचारिक पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि —
✔ ब्रिटिश रिकॉर्ड के माध्यम से हेनरी थॉमसन के असली वारिसों की तलाश की जाए
✔ जब तक असली उत्तराधिकारी सामने न आ जाएं, तब तक किसी भी सरकारी कार्रवाई को रोका जाए
आशीष मिश्रा का कहना है कि इस संपत्ति पर कुछ लोगों ने दावेदारी की है, लेकिन मूल मालिक ब्रिटिश नागरिक थे इसलिए उनके वारिसों की पहचान जरूरी है।
🧑🏭 मजदूरों और रोजगार का मुद्दा
पत्र में यह भी कहा गया है कि —
✔ हजारों भारतीय मजदूर इस फैक्ट्री से जुड़े थे
✔ यदि सही स्वामित्व के साथ फैक्ट्री का पुनरुद्धार (Revival) होता है
तो सीतापुर में —
👉 बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सकता है
👉 शहर की पुरानी औद्योगिक पहचान वापस आ सकती है
🇮🇳 बड़ा सवाल — क्या फिरंगियों को सौंपना सही होगा?
अब इस पूरे मामले में एक बड़ा राष्ट्रीय और नैतिक सवाल भी खड़ा हो रहा है।
👉 क्या भारत की जमीन को फिर से विदेशी वारिसों के हवाले करना सही होगा?
👉 क्या इतने वर्षों से खाली पड़ी जमीन को राज्य सरकार अपने नियंत्रण में लेकर औद्योगिक विकास के लिए उपयोग नहीं कर सकती?
कई लोगों का मानना है कि —
✔ यदि जमीन सरकार के पास आती है
✔ तो यहां नया उद्योग, औद्योगिक पार्क या रोजगार परियोजना शुरू हो सकती है
जिससे हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा।
वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि कानूनी स्वामित्व का सम्मान करना भी जरूरी है।
⚡ सीतापुर प्रशासन का सख्त रुख
पिछले कुछ महीनों में जिलाधिकारी राजा गणपति आर के नेतृत्व में सीतापुर प्रशासन कई बड़े फैसले ले चुका है —
✔ अवैध कब्जों पर कार्रवाई
✔ नगर निकायों का औचक निरीक्षण
✔ राजस्व जमीनों की जांच
✔ गैस कालाबाजारी पर छापेमारी
✔ प्रशासनिक पारदर्शिता पर सख्ती
इसी क्रम में यह प्लाईवुड फैक्ट्री का मामला भी सीतापुर के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा फैसला बन सकता है।
🔥 सीतापुर के लिए क्या है सही रास्ता?
अब पूरे जिले की नजर इस सवाल पर है —
👉 क्या ब्रिटिश वारिस सामने आएंगे?
👉 क्या यह जमीन राज्य सरकार के खाते में जाएगी?
👉 या फिर इस ऐतिहासिक फैक्ट्री का पुनरुद्धार होगा?
जो भी फैसला होगा, उसका असर सीतापुर के उद्योग, रोजगार और शहर की पहचान पर पड़ेगा।
📢 आपकी क्या राय है?
क्या यह जमीन सरकार के पास आकर नए उद्योग के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए
या फिर ब्रिटिश वारिसों को खोजकर उन्हें सौंपना चाहिए?
कमेंट में जरूर लिखें।
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सीतापुर शहर के हुसैनगंज इलाके में स्थित ऐतिहासिक हेनरी थॉमसन प्लाईवुड प्रोडक्ट्स फैक्ट्री का मामला अब स्थानीय प्रशासन से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है।
कभी एशिया की प्रतिष्ठित औद्योगिक इकाइयों में गिनी जाने वाली इस फैक्ट्री की करीब 150 बीघा की बेशकीमती जमीन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
🏭 एशिया की शान रही फैक्ट्री
यह फैक्ट्री वर्ष 1939 में ब्रिटिश नागरिक हेनरी थॉमसन और उनकी बहनों द्वारा स्थापित की गई थी।
एक समय था जब —
✔ इस फैक्ट्री का प्लाईवुड ऑस्ट्रेलिया से नेपाल तक निर्यात होता था
✔ लगभग 1000 से अधिक कर्मचारी यहां तीन शिफ्टों में काम करते थे
✔ सीतापुर की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक पहचान इसी फैक्ट्री से जुड़ी थी
लेकिन वर्ष 1987 में ब्रिटिश मालिकों के भारत छोड़ने के बाद यह फैक्ट्री धीरे-धीरे बंद हो गई और पिछले लगभग 25 वर्षों से पूरी तरह वीरान पड़ी है।
⚖ प्रशासन की बड़ी कार्रवाई
सीतापुर प्रशासन ने हाल ही में इस जमीन को लेकर बड़ा कदम उठाया।
जिलाधिकारी राजा गणपति आर ने 11 फरवरी 2026 को एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि —
👉 यदि इस जमीन का कोई वैध मालिक सामने नहीं आता
👉 या कोई कानूनी दावा सिद्ध नहीं होता
तो इस संपत्ति को राज्य सरकार के राजस्व में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इसके लिए प्रशासन ने 30 दिनों का समय भी दिया था।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह जमीन शहर के बीचों-बीच बेहद कीमती मानी जाती है।
🇬🇧 अब ब्रिटिश एंट्री
इसी बीच सीतापुर के पूर्व पालिकाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष मिश्रा ने इस मामले में एक नया मोड़ ला दिया है।
उन्होंने भारत में ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरन को एक औपचारिक पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि —
✔ ब्रिटिश रिकॉर्ड के माध्यम से हेनरी थॉमसन के असली वारिसों की तलाश की जाए
✔ जब तक असली उत्तराधिकारी सामने न आ जाएं, तब तक किसी भी सरकारी कार्रवाई को रोका जाए
आशीष मिश्रा का कहना है कि इस संपत्ति पर कुछ लोगों ने दावेदारी की है, लेकिन मूल मालिक ब्रिटिश नागरिक थे इसलिए उनके वारिसों की पहचान जरूरी है।
🧑🏭 मजदूरों और रोजगार का मुद्दा
पत्र में यह भी कहा गया है कि —
✔ हजारों भारतीय मजदूर इस फैक्ट्री से जुड़े थे
✔ यदि सही स्वामित्व के साथ फैक्ट्री का पुनरुद्धार (Revival) होता है
तो सीतापुर में —
👉 बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सकता है
👉 शहर की पुरानी औद्योगिक पहचान वापस आ सकती है
🇮🇳 बड़ा सवाल — क्या फिरंगियों को सौंपना सही होगा?
अब इस पूरे मामले में एक बड़ा राष्ट्रीय और नैतिक सवाल भी खड़ा हो रहा है।
👉 क्या भारत की जमीन को फिर से विदेशी वारिसों के हवाले करना सही होगा?
👉 क्या इतने वर्षों से खाली पड़ी जमीन को राज्य सरकार अपने नियंत्रण में लेकर औद्योगिक विकास के लिए उपयोग नहीं कर सकती?
कई लोगों का मानना है कि —
✔ यदि जमीन सरकार के पास आती है
✔ तो यहां नया उद्योग, औद्योगिक पार्क या रोजगार परियोजना शुरू हो सकती है
जिससे हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा।
वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि कानूनी स्वामित्व का सम्मान करना भी जरूरी है।
⚡ सीतापुर प्रशासन का सख्त रुख
पिछले कुछ महीनों में जिलाधिकारी राजा गणपति आर के नेतृत्व में सीतापुर प्रशासन कई बड़े फैसले ले चुका है —
✔ अवैध कब्जों पर कार्रवाई
✔ नगर निकायों का औचक निरीक्षण
✔ राजस्व जमीनों की जांच
✔ गैस कालाबाजारी पर छापेमारी
✔ प्रशासनिक पारदर्शिता पर सख्ती
इसी क्रम में यह प्लाईवुड फैक्ट्री का मामला भी सीतापुर के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा फैसला बन सकता है।
🔥 सीतापुर के लिए क्या है सही रास्ता?
अब पूरे जिले की नजर इस सवाल पर है —
👉 क्या ब्रिटिश वारिस सामने आएंगे?
👉 क्या यह जमीन राज्य सरकार के खाते में जाएगी?
👉 या फिर इस ऐतिहासिक फैक्ट्री का पुनरुद्धार होगा?
जो भी फैसला होगा, उसका असर सीतापुर के उद्योग, रोजगार और शहर की पहचान पर पड़ेगा।
📢 आपकी क्या राय है?
क्या यह जमीन सरकार के पास आकर नए उद्योग के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए
या फिर ब्रिटिश वारिसों को खोजकर उन्हें सौंपना चाहिए?
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“सीतापुर की 150 बीघा अंग्रेजों की फैक्ट्री… अब क्या होगा इसका भविष्य?” 🔥📈m_sitapur
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